दिल की धड़कन हो तुम मेरी आवाज़ हो।
या कि ख़ुद का छुपाया हुआ राज़ हो।।
चाँदनी में नहाता हुआ-सा बदन,
तुमको पाकर हमें क्यूँ नहीं नाज़ हो।
भोली सूरत से अठखेलियाँ ज़ुल्फ़ की,
शायरी हो कि शायर का अंदाज़ हो।
होंठ प्याले लगे हैं भरे जाम के,
इनको पीने भी दो क्यूँकर नाराज़ हो।
नफ़रतें हम भुला दें सदा के लिए,
ऐसे जीवन का फिर क्यूँ न आग़ाज़ हो।
मैं कन्हईया बना शाःजहाँ भी बना,
तुम हो राधा मिरी और मुमताज़ हो।
तुमको इतना समझता है दिल 'प्रेम' का,
इन्तिहा भी तुम्हीं तुम ही आग़ाज़ हो।।
(रचनाकाल- नवम्बर-2000)
Saturday, October 3, 2009
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